इप्टा ने सिखाया कला जीवन के लिए: शबाना आजमी: बिहार की पत्रकारिता में निवेदिता का नाम गंभीर पत्रकारिता करने वाले कुछेक पत्रकारों में लिया जाता है. कैफ़ी आज़मी इप्टा सांस्कृतिक केन्द्र के...
Wednesday, June 3, 2015
Saturday, March 8, 2014
Tuesday, April 30, 2013
अंतरराष्ट्रीय श्रमिक दिवस के रूप में जाना जाने वाला आज का दिन, यानि एक मई 1886 में शिकागो की मजदूर रैली की याद में मनाया जाता है. उस दिन मजदूरों ने अपने अधिकारों और दिन के काम की अवधि आठ घंटों तक सीमित करने के लिए शांति पूर्वक रैली का आयोजन किया. इसी बीच एक अज्ञात व्यक्ति ने उन पर बम फेंक कर रैली भंग करने की कोशिश की. इस घटना में दर्जनों मजदूरों ने अपनी जान गंवा दी और कई बुरी तरह घायल हुए. 1904 में एम्सटरडम में दुनिया भर के मजदूर संघ के प्रतिनिधियों की मौजूदगी में अंतरराष्ट्रीय समानता और अधिकारों को ध्यान में रखते हुए दिन के आठ घंटे काम करने को कानूनी मान्यता और एक मई को अंतरराष्ट्रीय मई दिवस के रूप में पहचान मिली. कई देशों में इस दिन सार्वजनिक अवकाश होता है.
मालिक आप नाहक नाराज़ हैं
मालिक, आखिर हवा तो आपके कहने से नहीं चलती
धूप का क्या करेंगे आप जो गिरेगी ही
आपकी बरौनियों पर
आपके ऊपर चढ़ कर खेलेंगी ही रोशनी की नटखट गिलहरियाँ
रंगों पर बस तो नहीं है आपका
आप जब भी निहारेंगे
वे खिल खिलाएंगे आपके खून में
छुपा-छुपी खेलने लगेंगे
घुस कर
इन सबको मना तो नहीं कर सकते आप
मैं ठीक कह रहा हूँ मालिक,
आप नाहक नाराज़ हैं
भूल जाइये बिलकुल उन चीज़ों को
जिन पर हुक्म नहीं चलता आपका
आखिर हवा किसनिया कहारिन तो है नहीं मालिक ,
जो कराहती हुई
चौका-बासन करे आपका
बाल्टी भर-भर पानी छत तक चढ़ाए ,
दो घंटे छोटे बाबू को बहलाए
और फिर आपका बिछौना बिछाए
आखिर धूप सुरजा तो है नहीं मालिक जिसकी कमीज़ आप गुस्से में फाड़ दें
और जिसकी काली पीठ पर
अपनी चिलमची के गुल झाड़ दें
धूप सुरजा बिलकुल नहीं हैं मालिक,
जिसे आप अपने दरबार में उंकड़ू बैठा कर
गरियाते रहें
और पीटते रहें
और रंग ?
रंग आपके चाकर नहीं हैं सरकार
जो आपका लिहाज़ करें
हुक्का भर-भर लाएं, सलाम बजाएँ ,
आपकी ड्योढ़ीदारी करें
आपके बनिहारों के बच्चे नहीं हैं ये भोले-भाले रंग
जो आपको देख कर , डर कर
अपने-अपने ओसारों में छुप जाएं
इन सब पर नाहक ही बिगड कर अपना खून जला रहे हैं आप
बे-बात की बात पर बड़ -बड़ा रहे हैं आप
आखिर जेठ की धूप में आंच तो रहेगी ही मालिक,
आखिर हवा में धूल-धक्कड़
तिनका-पत्ता तो होगा ही
मालिक, ये धूप है
जेठ की असल
जैसे-जैसे सूरज चढ़ेगा और धरती घूमेगी
यह और तप -तपाएगी
गर्म लाल लोहे की तरह
और मोम की तरह चुएँगे आप
और हवा ?
इसके मन की बात तो मत पूछिए मालिक,
जितना ही आप गुस्सायेंगे
उतना ही सर पर चढ़ कर दौड़ेगी आपकी कंघी-पाटी मेटती हुई
आपकी कोई बात इसके कलेजे लगी तो
फिर मत पूछिएगा सरकार
हवा बिगड़ जाती है तो कहर ढाती है
कंगूरे, गुम्बद, किले सब बिखेर डालती है
जहाज़ों को गेंद की तरह उछालती है
नदियों को फुहार बना देती है
तिनगी को बडवागिन
आप तो फिर क्या हैं मालिक !
फूस की तरह उड़ेंगे अंधड़ में
पटखनी खायेंगे खपरैलों में
बे-पर्द अलग हो जाएंगे
और नीचे
धरती पर
इत्ते सारे -इत्ते सारे रंग
सबके सब
आपका मज़ाक बनाएंगे ।
('सुनो कारीगर' संग्रह, (1980), वाणी प्रकाशन , नई दिल्ली से प्रकाशित / १९७ ६ में लिखी गई एक कविता)

पहली मई
Tuesday, February 12, 2013
राजेश पाण्डेय रायबरेली के नए पुलिस प्रमुख
विधान भवन के सामने गणतन्त्र दिवस पर होने वाली परंपरागत परेड के दौरान पुलिस वर्दी पर अनेक मैडल लगाये यह शख्स है राजेश पाण्डेय। प्रांतीय पुलिस सेवा से भारतीय पुलिस सेवा में प्रोन्नति के बाद राजेश पाण्डेय को रायबरेली का नया पुलिस प्रमुख नियुक्त किया गया है। बेहद सह्रदय इस पुलिस अधिकारी की कर्त्तव्यपरायणता और जाबांजी के प्रमाण हैं सीने पर सजे मैडल। रायबरेली से पूर्व श्री पाण्डेय एंटी टेररिस्ट स्कवायड में ए एस पी से एस पी बनाये गये थे। राजेश पाण्डेय वर्षो पूर्व जौनपुर में पुलिस क्षेत्राधिकारी नगर रह चुके हैं।
Thursday, May 24, 2012
दौड़ती पुलिस,हाँफती पुलिस,भागती पुलिस
अरविन्द उपाध्याय
जैसे-जैसे मौसम का पारा चढ़ता गया जौनपुर में अपराध
की तपिश भी बर्दाश्त से बाहर होती गयी.पुलिस महकमे के कमांडर ने मातहतों के सभी पेंच कसने के
लिए क्या-क्या नहीं किया.नियमित वाहन चेकिंग करवायी,फिर उसकी भी चेकिंग की.रिहर्सलों
का दौर चला.फिलहाल सारी कवायदों का नतीजा आना बाकी है.कमांडर की इस हांकागिरी से मातहतों
के पसीने तो खूब छूटे लेकिन बजरंगबली की कृपा से हौसला बचा रह गया.पसीना तो बहरहाल
छूटना ही था.एक तरफ आग उगलती गरमी, दूसरी तरफ बूट,जिरहबख्तर से लेकर हेलमेट तक कस कर
राइफल ताने किसी अदृश्य अपराधी के पीछे भागने की कवायद.एंटी रायट रिहर्सल के तुरंत
बाद एक 'पुलिस जी'ने तो खैनी मलते हुए अपना फैसला सुना ही डाला कि 'कहीं रिहर्सल से
अपराध रुकता है'.खैर राय देने से किसी को कोई कैसे रोक सकता है?फिर जले-भुने लोगों
को जली-कटी सुनाने का विशेषाधिकार भी है.दरअसल
पिछ्ले कई सालों से हर मामले में चवन्नी-अठन्नी की गुंजाइश देखने की महकमे को आदत सी
पड़ गयी है.'ऊपर पहुँचाना पड़ता है,हम क्या करें'का ब्रह्मास्त्र सबकी बोलती बंद कर देता
था.यह फायदेमंद आदत कोई बदलने के मूड में नहीं है.आम लोग महसूस कर रहें हैं कि कमांडर
की कोशिश में कमी नहीं है लेकिन नीचे के लोग साथ नहीं दे रहे हैं.शायद ऊपर के लोग भी
समझ रहे हैं,इसलिए कार्रवाई का चाबुक चलना शुरु हो गया है.यह स्थिति पूर्व के भी कुछ
तेज अफ़सरों को झेलनी पड़ी है लेकिन आम लोग,खास कर सही सोच के बुध्दिजीवी वर्ग ने मुखबिर
घोषित होने जैसी जलालत का खतरा उठा कर भी पीछे से साथ दिया.देखते हैं रस्साकसी कब खत्म
होती है.
Thursday, May 17, 2012
वसूली 'गुन्डा टैक्स' की
अरविन्द उपाध्याय
Subscribe to:
Posts (Atom)



